Wednesday, June 3, 2020

कोरोना संकट:मनुष्य और सृष्टि

वर्तमान में जो परिस्थिति निर्मित हुई है, वह निश्चित रूप से अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, समूची दुनिया पर इसका बड़ा ही बुरा प्रभाव पड़ा है । फ़िलहाल तो ये बताना भी मुश्किल है कि स्थितियाँ कब सामान्य होंगी ? एक बड़ी आबादी का जीवन ख़तरे में पड़ गया है । चारों तरफ़ अनिश्चितता का माहौल है ।

इस बीच लोगों ने अपना बहुत कुछ खो दिया है–अनेकों ने अपनी बचतें  खो दी हैं । वे आर्थिक रुप से असुरक्षित हो गये हैं । समाज–परिवार के होते हुए भी लोग एकाकी जीवन जीने को विवश हो गये हैं ।

लोगों का व्यापार–धंधा, सब-कुछ चौपट हो गया है । इनकी अपूरणीय क्षति हुई है ।

इधर कोरोना वायरस के उपचार या वैक्सीन बनाने की दिशा में किसी को कोई सफ़लता नहीं मिली है, और निकट भविष्य में भी इसकी सम्भावना भी कम ही दिख रही है ।

अब सवाल ये है कि लोग क्या करें ?  क्या हाथ पे हाथ धरकर बैठे रहें और उदास, निराश, हतोत्साहित हो जायें ? 

आर्थिक असुरक्षा का भाव से एक बारगी तो उबरना ही होगा । इसी से नकारात्मकता समाप्त होगी और जो दैनन्दिन जीवन में अनियमितता आई है, उससे भी छुटकारा मिलेगा । लोगों से ख़त्म हो रहे संबंधों को सहेजना होगा ।

कोरोना वायरस से हमारी संस्थाएँ अपने हिसाब से तो लड़ रही हैं पर दूसरी ओर हमें भी व्यक्तिगत रुप से इसके संभावित दुष्प्रभावों से लड़ते रहना होगा ।

आख़िर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । उसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए ! उसे खुद की और परिवार का ख़्याल तो रखना ही है, यथासंभव समाज के दूसरे लोगों का भी रखना है । 

इस ख़ालीपन के समय में आत्मचिंतन का अच्छा अवसर मिला है । अपने व्यसनों से छुटकारा पाने का अच्छा अवसर मिला है । स्वयं को, ईश्वर को और समूची सृष्टि को नये सिरे से परखने, समझने और आत्मसात् कर एक बेहतर दुनिया बनाने का अवसर मिला है ।

आईये, हम सभी इस महामारी को भी मानव कल्याण के एक अभूतपूर्व अवसर में बदलने पर काम करें !

दिनेश राव

चिन्तन एवं चिन्ता

विश्वास

Tuesday, May 12, 2020

कोरोना का प्रभाव

कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं और महा संकट के जो बादल छाए हैं, उसके टलने का निकट भविष्य में कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। 

संकट टलने के पश्चात भी पूरी दुनिया पर इसका जो दुष्प्रभाव पड़ेगा, वह भी बड़ा भयावह होगा! यह कोई डराने वाली बात नहीं है, वरन यह एक कटु सत्य है। 

जब किसी राष्ट्र पर संकट आता है, तो प्रत्येक नागरिक उससे प्रभावित होता ही है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। ‘वह प्रभाव क्या होगा?’ इस बारे में हम ठीक तरह से अनुमान भी नहीं लगा सकते!

फिलहाल हमारे पास हर क्षेत्र में अतिरिक्त सावधानी बरतने के अलावा कोई चारा नहीं है, जैसे; स्वास्थ्य, स्वच्छता, शुद्धता के साथ आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक मामलों में विशेष सावधानी बरतना। 
हमें मितव्ययिता बरतनी पड़ेगी। 

जो परिस्थिति निर्मित हुई है और जो होने वाली है, उससे अप्रभावित रहने के लिए हमें अतिरिक्त मानसिक तैयारी की भी आवश्यकता है। 
इसके लिए योगासन, प्राणायाम, प्रातः भ्रमण करना होगा। सन्तुलित भोजन व अच्छी निद्रा लेते हुए व्यसनों से बचना होगा। ध्यान-साधना, स्तुति-प्रार्थना, सत्संग, आध्यात्मिक ग्रन्थों का पाठन, चिन्तन, प्रभु-सुमिरन, हवन–यज्ञ जैसे दूसरे उपाय हैं, इनसे भी लाभ लेना होगा।

हम सबको नि:स्वार्थ भाव से मानव सेवा करनी होगी। प्रेम, दया-करुणा के मार्ग पर चलकर ही यह संभव है।

मीडिया में फैलायी जा रही जातीय–धार्मिक–क्षेत्रीय–भाषागत–वर्गगत–लैंगिक असमानता को नकारकर नफ़रत के सौदागरों की दुकानें बंद करनी होंगी!

यदि हम सृष्टि द्वारा दिये गए संकेत को समझने में सफ़ल होते हैं, तो यह मान कर चलें कि एक सुनहरा भविष्य हमारा इंतज़ार कर रहा है!


राग

एक औरत

Monday, May 11, 2020

ईर्ष्या भाव का परिणाम

जिस प्रकार अग्नि सूखे पत्तों को प्रज्वलित कर ख़ाक में परिवर्तित कर देती है, उसी प्रकार ईर्ष्या भाव मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से नष्ट कर देती है ।

Sunday, May 10, 2020

केवल सबका हित का विचार करें

यदि हम किसी को बरबाद करने की ठान रखे हैं, तो ऐसा इरादा तत्काल त्याग दीजिये, क्योंकि किसी को आबाद या बरबाद करना प्रभु एवं काल के हाथ में है ।  ऐसा इरादा हमारा सर्वनाश कर देगा, उसका तो कुछ नहीं होगा ।

Saturday, May 9, 2020

व्यसन

किसी भी प्रकार का छोटा से छोटा व्यसन भी घातक परिणाम देता है, चिन्तन करते हुए हर प्रकार के व्यसन से बचना चाहिए ।

Friday, May 8, 2020

चिन्ता एवं चिन्तन

मानव जीवन में चिन्ता सर्वनाश का कारण बनता है, जबकि चिन्तन सर्वांगीण विकास का ।

Saturday, May 2, 2020

मानव जीवन में सदगुरू की महत्ता

हम सदगुरु के शिष्य, सदगुरु की महानता एवं हमारे जीवन में उनके महत्व से भलीभाँति वाकिफ़ हो गए हैं । हम जान गए हैं कि सदगुरु की कृपा से ही हमारा सर्वांगीण विकास सम्भव है । हम जानते हैं कि सदगुरु की प्रसन्नता में ही हमारा कल्याण है । हम यह भी मानते हैं कि हमारी समस्याओं, उलझनों, रोगों का निदान सदगुरु दया से सम्भव है । हम यह चाहते हैं कि सदगुरु हमसे प्रसन्न रहें, हम पर सदैव सदगुरु कृपा की बारिश होती रहे, सदगुरु की दया दृष्टि हम पर बराबर बनी रहे । हम सदगुरु से स्वयं के लिए बहुत कुछ चाहते हैं, परन्तु हम स्वयं के कर्त्तव्य के प्रति पूर्ण रूप से उदासीन हैं, विशेषकर "साधना(ध्यान)" के विषय में । हमें यह मानना पड़ेगा कि जितना समय हमें साधना में देना चाहिए, उतना समय हम नहीं दे रहे हैं एवं जितनी नियमित हमारी साधना होनी चाहिए, उतनी नियमित नहीं है । जिस प्रकार सन्सार के प्रत्येक कर्त्तव्य को हम अपना 100% देकर निभाते हैं, वही भाव हमारा साधना के प्रति भी होना चाहिए ।

हमारी साधना नियमित रूप से होने लगे, अधिक समय तक हम साधना में बैठने में सक्षम हो सकें, साधना में हमारी उत्तरोत्तर प्रगति हो, साधनात्मक अनुभव हमें होने लगे, हमारा आध्यात्मिक विकास हो, हम एक सच्चे इन्सान बन सकें, हमारी आदतें– विचार– व्यवहार– कर्म आदर्श हों, हमारा व्यक्तित्व प्रभावशाली हो, प्रेम– करुणा– दया– क्षमा– अहिंसा– सहायता ---------- आदि गुणों को हम धारण कर सकें, सांसारिक रिश्तों को हम पूर्ण निष्ठा से निभा सकें, हम हर हमेशा ऊर्जावान रह सकें, हमारे जीवन में उत्साह– उल्लास– उमंग– उत्तेजना का समावेश हो । हम निरोगी एवं दीर्घजीवी हों.....................

Wednesday, April 29, 2020

कविता–"मोह एक अनन्त मरीचिका"

कहीं खुशी कहीं गम
कभी खुशी कभी गम
ऐसा लोग कहते हैं ।
परन्तु मैंने तो पाया है,
हर खुशी के पीछे गम,
हर खुशी के पीछे आँसू ।
खुशी तो मात्र मुखोटा है,
असल चेहरा तो गम ही है।

पूरी दुनिया यही है,
लोग अपने दर्द को,
अपने आंसुओं को छुपाये,
खुशी का मुखोटा लगाए,
भटक रहे हैं इधर उधर ।
मुखोटा हटायें किसी तरह तो,
पायेंगे चेहरा आँसुओं से लथपथ।

रिश्ते भी महज़ धोखा है,
कब किस रिश्ते ने,
हमें सुख दिया है,
तसल्ली दी है,
बल दिया है जीने का ।
हमारा अकेले का कारंवा,
सुखद था, एक सन्तोष था ।
कारंवा में लोग जुड़ते गए,
गमों का विस्तार होता चला गया ।

जिन रिश्तों के जीवन के लिए,
हमने अपना सब कुछ खो दिया,
वे रिश्ते अब हमारे समक्ष,
खड़े हैं प्रश्नों का, आशंकाओं का,
एक महासागर लिए ।
अब तो रिश्तों के नाम पर,
घृणा होती है ।
इन आँखों ने,
रिश्तों को तारतार होते देखा है,
महज एक तुच्छ स्वार्थ के ख़ातिर ।

जीन रिश्तों के समक्ष,
हमनें विश्वास का समुन्दर उड़ेल दिया,
वे रिश्ते अब हमारे विश्वसनीयता की,
अत्यन्त कठिन परीक्षा ले रहे हैं ।
यहाँ परीक्षक भी वही हैं,जाँचकर्ता भी वही हैं,
घोषित परिणाम करने वाले भी वही हैं ।

क्या यही है जीवन,
क्या हम जन्म लिए हैं,
गमों का बोझ ढ़ोने के लिए ही,
होने आँसुओं से लथपथ ।
क्या कोई रास्ता है,
इस गम भरे जीवन से निज़ात पाने का,
जीवन को खुशियों से भर पाने का ।

मुझे तो अब लगता है,
रोते हुए आये हैं हम,
जीवन भर रोते रहे,
अंत में भी रोना ही है ।
आश्चर्य जिस जीवन ने,
हमें केवल गम दिया, 
धोखा और आँसू दिए,
उस जीवन से यह कैसा मोह ?

–दिनेश राव

Tuesday, April 28, 2020

जीवन का प्रमुख उद्देश्य

हम लोग मूलतः अमरलोक के वासी हैं ,  जहाँ हम कभी मनभावनी मुक्ति अवस्था में थे, परमात्मा के सानिध्य में थे, सच्चिदानन्द स्वरूप थे, उस स्थान पर अनन्त सूर्यों का प्रकाश था, परमानन्द के अनन्त–महासागर में हम डुबकी लगा रहे थे । हममें अहंकार का भाव उत्पन्न हुआ, फलस्वरूप हमारा पतन हुआ, हम इस प्रकृति में आ गए, जो कि  दुख एवं अशांति का महासागर है । हम इस दुःख एवं अशांति से छुटकारा पाना चाहते हैं । इस हेतु हम सतत अनेक उपाय भी करते हैं, परन्तु हमारा हर उपाय हमारे दुःख एवं अशांति को बढ़ाता ही जाता है, सुकून के पल नसीब ही नहीं हो पाते हैं । हम और इस प्रकृति में बंधते चले जाते हैं । हमारे इस दुर्गति का एकमात्र कारण हमारा अहंकार ही है, इस अहंकार को जड़मूल से समाप्त करने के स्थान पर हमारा हर कर्म, हर प्राप्ति इसे पोषित ही करती रहती है । अहंकार को जड़मूल से समाप्त करने का इस धरती पर एक ही उपाय है–विहंगम योग की साधना, साधना के साथ हम सत्संग एवं सेवा भी करते रहें । श्री सदगुरू प्रभु जी की परम् कृपा से हमारा अहंकार जड़मूल से समाप्त हो जावेगा, हम समाधि अवस्था प्राप्त कर लेंगे, हम अपने निज लोक अमरलोक जाने के पात्र बन जायेंगे, जीवनमुक्त अवस्था प्राप्त कर लेंगे । और-------------यही हमारा जीवन का मूल उद्देश्य भी है । हम अपने मूल उद्देश्य को न भूलें ।

हमारा स्थायी निवास "अमर लोक"

एलॉट्रॉनिक मीडिया में एक समाचार प्रसारित हो रहा है कि एक महिला जो कि बीजापुर(छत्तीसगढ़) की निवासी थी, वह राजस्थान में नॉकरी कर रही थी । लॉक डाउन में राजस्थान में फंस गई, अपने घर जाने की उसे इतनी तीव्र इच्छा हुई कि वह राजस्थान से घर के लिए पैदल ही निकल पड़ी(जबकि राजस्थान से बीजापुर की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 1100किलोमीटर है), अत्यन्त दुःखद विषय यह कि वह महिला बीजापुर पहुँचने के 10 किलोमीटर पहले ही दम तोड़ दी । लॉक डाउन काल में इस प्रकार की अनेक घटनायें समक्ष आ रही हैं कि घर पहुँचने की तीव्र तडफ़ से लोग घर की ओर पैदल ही चल पड़े एवं घर पहुँचने के थोड़ी ही दूरी पहले दम तोड़ दिए । उन सब मृतात्माओं को श्रद्धान्जलि अर्पित करते हुए एक चिन्तन उत्पन्न होता है कि पूर्ण रूप से अस्थायी निवास एवं अपने रिश्तेदारों से मिलने की हममें इतनी तीव्र तडफ़ होती है ।  तो हमारे उस स्थायी निवास *अमरलोक* जाने एवं हमारे अपने पिया *प्रभु(परमात्मा)* से मिलने की हममें कितनी तडफ़ होनी चाहिए ????  और.......... यह जीवित रहते हुए ही सम्भव है(मृत्यु के पश्चात नहीं) ।  इस परम् उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही यह देव दुर्लभ मानव तन हमें प्राप्त हुआ है । इस विषय में हम पूर्ण गम्भीरता से चिन्तन-मनन करें ।

मानव जीवन में मन की भूमिका

_*मानव जीवन में मन की भूमिका*_

*मन के हारे हार है! मन के जीते जीत!!*

*मन चंगा तो कठौती में गंगा !*

मानव जीवन में मन की बड़ी भूमिका है । मन के नियंत्रण में न होने से अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ, विसंगतियाँ, समस्यायें, उलझने--------स्वतः ही उत्पन्न हो जाती हैं । रोगों का कारण भी मन ही है, मन में सर्वप्रथम रोग उत्पन्न होता है, तब तन रोगी होता है । ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, अनिद्रा-----जैसे लाइलाज महारोगों के पीछे भी मन ही है । इन रोगों का मूल कारण तनाव है, तनाव का कारण मन का विचलन ही है । क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष-----आदि भावों का कारण भी मन है, हम अच्छी तरह से जानते हैं कि इन भावनाओं का हमारे जीवन में कितना दुष्प्रभाव पड़ता है , ये भावनायें हमारा जीवन को नर्क सा बना देती हैं । उत्साह, उमंग, उल्लास एवं उत्तेजना पूरित हमारा जीवन होना चाहिए, परन्तु हम पाते हैं कि इनका हमारे जीवन में नितांत अभाव है, इनके बगैर हमारा जीवन पूर्ण रूप से नीरस है । जीवन में नकारात्मक भाव का कारण भी मन ही है । हम जानते हैं कि जीवन संग्राम में हर क्षेत्र में विजयी होने के लिए सकारात्मक भाव की हमें कितनी आवश्यकता है ??
अब प्रश्न उठता है कि जब मानव जीवन में मन के नियंत्रण की इतना महत्व है, तो यह कैसे सम्भव हो पायेगा ??
इस पृथ्वी पर मन पर नियंत्रण का एक मात्र उपाय है– *विहंगम योग* ।
विहंगम योग की साधना से मन पर पूर्ण नियन्त्रण पाया जा सकता है, यहाँ तक कि हम इस साधना के द्वारा मन को अपने कारण अक्षर में विलीन कर अमन भी हो सकते हैं ।
जब विहंगम योग की साधना इतनी प्रभावशाली है, जीवन के लिए उपयोगी है या यह कहा जाए तो  अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि विहंगम योग की साधना के बगैर जीवन जीना ही असम्भव है । 
तो क्यों न हम विहंगम योग की साधना को अपने दिनचर्या का अंग बना लें ??
क्यों न हम ऐसा प्रयास करें कि हमारी जीवन शैली में विहंगम योग की साधना पूर्ण रूप से समाहित हो जाये ??

सदगुरु का शिष्य होना

हम सभी सद्गुरु शिष्यों में यह स्वाभिमान का भाव पूर्ण रूप से होना चाहिए कि हम अपने सहपाठियों–सहकर्मियों–परिजनों–मित्रजनों से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि हमें सद्गुरु की प्राप्ति हो गयी है । सद्गुरु परमात्म स्वरूप हैं, सद्गुरु की प्राप्ति का अर्थ है–परमात्मा की प्राप्ति । हमारा त्रयताप दुःखों से निवृत्ति एवं आवागमन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त है । गम्भीरता से विचार कीजिये हम सब कितने भाग्यशाली हैं ?
 सद्गुरु की प्राप्ति के पश्चात हमारा प्रथम कर्त्तव्य है कि हम सद्गुरु के आदेशों का अक्षरसः पालन करें । इसमें किसी भी स्थिति–परिस्थिति में कोताही न करें । इसमें ही हमारा कल्याण निहित है ।
 सद्गुरु का आदेश क्या है:– साधना–सेवा–सत्संग ।
सन्सार की चिंता हम क्यों करें ? सद्गुरु देव जी ने तो कहा है–"मैं चारों फ़ल का प्रदाता हूँ । मैं अपने शिष्यों–भक्तों का योगक्षेम करता हूँ ।"
सेवा एवं सत्संग तो हम थोड़ा-बहुत कर भी लेते हैं, परन्तु साधना में हम अब काफ़ी पीछे हैं (साधना के सम्बन्ध में हम स्वयं से प्रश्न करें तो यही उत्तर आएगा) ।
हम विधिवत साधना करें । हमारा यह प्रयास(पुरुषार्थ) होना चाहिए कि हम वर्तमान शरीर से जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त कर लें, परमात्मा की प्राप्ति हो जावे, पुनः हमें प्रकृति में न आना पड़े(आवागमन से मुक्ति पा जायें) ।

Tuesday, April 14, 2020

परमात्मा के प्रति कृतज्ञता का भाव

परमात्मा के प्रति शिकायत नहीं वरन सदैव हर हालात में कृतज्ञता का भाव हॄदय में रखना चाहिए ।

अनमोल मानव जीवन


मानव जीवन परमात्मा का एक अनमोल उपहार है, इसका हर पल आनन्द एवं शान्ति से व्यतीत हो, इस दिशा में हमारा सतत गम्भीर प्रयास होना चाहिए ।

Sunday, April 12, 2020

आत्मकल्याण की सार्थकता

सन्सार में हम सब कुछ पाकर भी उसका सुख प्राप्त नहीं कर सकते हैं, जब तक कि हम आत्म कल्याण के लिए समुचित प्रयास नहीं करते हैं ।

Saturday, April 11, 2020

मानव का सर्वांगीण विकास

मानव का सर्वांगीण विकास केवल सदगुरू शरण में रहकर साधना–सेवा–सत्संग करने में ही है और अन्य कोई उपाय नहीं है ।

Friday, April 10, 2020

आत्मिक उद्धार

प्रत्येक मानव का यह परम कर्त्तव्य है कि वह आत्मिक उद्धार को सर्व प्राथमिकता प्रदान करे, आत्मिक उद्धार के बगैर यदि यह जीवन समाप्त हो गया तो यह जीवन व्यर्थ है । अतः अपनी दिनचर्या में सांसारिक कार्यों को जिस प्रकार हम समयबद्ध करते हैं, उसी प्रकार आत्मिक उद्धार के लिए भी हमें समय सुनिश्चित करना चाहिए ।

Thursday, April 9, 2020

मानव जीवन की सार्थकता

हम सम्पूर्ण सन्सार को जानने का दावा करते हैं, यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हम स्वयं को जान पाए हैं ? सन्सार को जानने की अपेक्षा स्वयं को जानने में ही मानव जीवन की सार्थकता है ।

मानव कौन?

यदि कोई व्यक्ति हमारे प्रति विरोधी भाव रखता है तो वह उसका धर्म है, परन्तु हमारा धर्म यह है कि हम उसके प्रति कोई विरोधी भाव न रखें । सदैव हम सबका हित चिन्तन करें, जरूरत पड़ने पर हर हमेशा सहयोग के लिए तत्पर रहें । अन्य के सुख में अपना सुख, अन्य के विकास में अपना विकास समझने वाला व्यक्ति ही वास्तव में मानव कहलाने योग्य है ।

Tuesday, April 7, 2020

आलोचना

कोई यदि हमारी किसी भी प्रकार की आलोचना करता है, तो हम उस व्यक्ति के प्रति कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचें, बल्कि हम आत्मावलोकन करें कि व्यक्ति के कथनानुसार हममें कोई दोष तो नहीं है, यदि ऐसा कुछ है तो दोष का निराकरण करें ।

Monday, April 6, 2020

संवाद की शर्तें

हम जब भी किसी व्यक्ति से संवाद कर रहे हों, तब हमें इन बातों का पूर्ण रूप से ध्यान रखना चाहिए–हमारे हृदय में व्यक्ति के प्रति पूर्ण सम्मान एवं प्रेम का भाव हो, वाणी में कोमलता हो, स्वयं में विनयशीलता हो,  हमारे हृदय में उस व्यक्ति का हित का चिन्तन हो, हम किसी प्रकार से पूर्वाग्रह से ग्रसित न हों, भाषा पर पूर्ण नियंत्रण हो, व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान हो ।

Sunday, April 5, 2020

सदगुरु की सेवा

सेवा के द्वारा श्री सदगुरु प्रभु जी को प्रसन्न कर हम स्वयं का पूर्ण आत्मिक एवं सांसारिक कल्याण कर सकते हैं, इसके अलावा इस धरती पर इसके लिए अन्य कोई उपाय नहीं है ।

दान की सार्थकता

देने का भाव एवं फल प्राप्ति की इच्छा शून्य होने पर ही दान सार्थक होता है ।

पूर्वाग्रह

अध्यात्म हो या सन्सार शिखर तक पहुँचने के लिए समस्त पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना पड़ेगा । पूर्वाग्रहों का भार लेकर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते हैं ।

Friday, April 3, 2020

जीवन का उद्देश्य

मानव जीवन का परम् उद्देश्य आत्म कल्याण एवं गौण उद्देश्य सांसारिक उपलब्धियाँ हैं, परन्तु इसका स्पष्ट बोध हमें न होने के फ़लस्वरूप हमारे समक्ष अनेक प्रकार की समस्यायें, उलझने, विसंगतियाँ, रोग------उपस्थित हैं ।

Monday, March 30, 2020

चिन्ता का परिणाम

चिन्ता हमारे चिता का मार्ग प्रशस्त करता है ।

Thursday, March 26, 2020

चिन्तन


चिन्तन हमारे सर्वांगीण विकास का कारण बनता है, यहाँ तक कि यह हमारे परमात्मा प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर देता है ।

Wednesday, March 25, 2020

देवत्व

प्रेम, करुणा, दया, क्षमा, अक्रोध, अहिंसा------देवत्व गुण हैं, हॄदय में यदि यह भाव किसी मनुष्य में समावेशित हो गए तो वह मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर हो जावेगा ।

Tuesday, March 24, 2020

भाव की शुद्धता

यदि हम अपने हॄदय में किसी अन्य व्यक्ति के प्रति द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा-------का भाव पाल कर रखे हैं, तो वे भाव हमें ही दीमक जैसा चाट जायेंगे, और एक दिन हमारे सर्वनाश का कारण बनेंगे ।

Friday, March 20, 2020

सकारत्मकता


जीवन में जब हम सकारात्मक विचार लेकर चलते है, तो विपरीत परिस्थितियां भी अनुकूल होने लगती हैं ।

Thursday, March 19, 2020

जीवन में जीवन्तता

मानव जीवन में जीवन्तता तभी है, जब जीवन में उत्साह, उल्लास, उमंग, उत्तेजना का  समावेश हो !

Wednesday, March 18, 2020

मानव जीवन की समस्याएँ

मानव जीवन की समस्त समस्याओं का एकमात्र हल सदगुरु शरण में  है ।

जीवन की सार्थकता

आत्मा को मनुष्य देह का प्राप्त होना, अत्यन्त दुर्लभ है, कितने ही युग–कल्प व्यतीत होने के पश्चात प्रभु की अहेतुकी कृपा से यह सौभाग्य प्राप्त होता है । इससे अधिक दुर्लभ है–सदगुरु का मिलना । सदगुरु के मिलने के पश्चात दुर्लभ है–सदगुरु की सेवा का अवसर प्राप्त होना । अतः जब भी सेवा का परम दुर्लभ अवसर प्राप्त हो, उस अवसर से किसी भी स्थिति–परिस्थिति में नहीं चूकना चाहिए । सेवा ही भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और भक्ति सर्व प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है ।

Tuesday, March 17, 2020

मानव जीवन

मानव जीवन में यदि पाने की इच्छा एवं खोने का डर समाप्त हो जावे तो, तब जीवन का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है ।