Wednesday, April 29, 2020

कविता–"मोह एक अनन्त मरीचिका"

कहीं खुशी कहीं गम
कभी खुशी कभी गम
ऐसा लोग कहते हैं ।
परन्तु मैंने तो पाया है,
हर खुशी के पीछे गम,
हर खुशी के पीछे आँसू ।
खुशी तो मात्र मुखोटा है,
असल चेहरा तो गम ही है।

पूरी दुनिया यही है,
लोग अपने दर्द को,
अपने आंसुओं को छुपाये,
खुशी का मुखोटा लगाए,
भटक रहे हैं इधर उधर ।
मुखोटा हटायें किसी तरह तो,
पायेंगे चेहरा आँसुओं से लथपथ।

रिश्ते भी महज़ धोखा है,
कब किस रिश्ते ने,
हमें सुख दिया है,
तसल्ली दी है,
बल दिया है जीने का ।
हमारा अकेले का कारंवा,
सुखद था, एक सन्तोष था ।
कारंवा में लोग जुड़ते गए,
गमों का विस्तार होता चला गया ।

जिन रिश्तों के जीवन के लिए,
हमने अपना सब कुछ खो दिया,
वे रिश्ते अब हमारे समक्ष,
खड़े हैं प्रश्नों का, आशंकाओं का,
एक महासागर लिए ।
अब तो रिश्तों के नाम पर,
घृणा होती है ।
इन आँखों ने,
रिश्तों को तारतार होते देखा है,
महज एक तुच्छ स्वार्थ के ख़ातिर ।

जीन रिश्तों के समक्ष,
हमनें विश्वास का समुन्दर उड़ेल दिया,
वे रिश्ते अब हमारे विश्वसनीयता की,
अत्यन्त कठिन परीक्षा ले रहे हैं ।
यहाँ परीक्षक भी वही हैं,जाँचकर्ता भी वही हैं,
घोषित परिणाम करने वाले भी वही हैं ।

क्या यही है जीवन,
क्या हम जन्म लिए हैं,
गमों का बोझ ढ़ोने के लिए ही,
होने आँसुओं से लथपथ ।
क्या कोई रास्ता है,
इस गम भरे जीवन से निज़ात पाने का,
जीवन को खुशियों से भर पाने का ।

मुझे तो अब लगता है,
रोते हुए आये हैं हम,
जीवन भर रोते रहे,
अंत में भी रोना ही है ।
आश्चर्य जिस जीवन ने,
हमें केवल गम दिया, 
धोखा और आँसू दिए,
उस जीवन से यह कैसा मोह ?

–दिनेश राव

Tuesday, April 28, 2020

जीवन का प्रमुख उद्देश्य

हम लोग मूलतः अमरलोक के वासी हैं ,  जहाँ हम कभी मनभावनी मुक्ति अवस्था में थे, परमात्मा के सानिध्य में थे, सच्चिदानन्द स्वरूप थे, उस स्थान पर अनन्त सूर्यों का प्रकाश था, परमानन्द के अनन्त–महासागर में हम डुबकी लगा रहे थे । हममें अहंकार का भाव उत्पन्न हुआ, फलस्वरूप हमारा पतन हुआ, हम इस प्रकृति में आ गए, जो कि  दुख एवं अशांति का महासागर है । हम इस दुःख एवं अशांति से छुटकारा पाना चाहते हैं । इस हेतु हम सतत अनेक उपाय भी करते हैं, परन्तु हमारा हर उपाय हमारे दुःख एवं अशांति को बढ़ाता ही जाता है, सुकून के पल नसीब ही नहीं हो पाते हैं । हम और इस प्रकृति में बंधते चले जाते हैं । हमारे इस दुर्गति का एकमात्र कारण हमारा अहंकार ही है, इस अहंकार को जड़मूल से समाप्त करने के स्थान पर हमारा हर कर्म, हर प्राप्ति इसे पोषित ही करती रहती है । अहंकार को जड़मूल से समाप्त करने का इस धरती पर एक ही उपाय है–विहंगम योग की साधना, साधना के साथ हम सत्संग एवं सेवा भी करते रहें । श्री सदगुरू प्रभु जी की परम् कृपा से हमारा अहंकार जड़मूल से समाप्त हो जावेगा, हम समाधि अवस्था प्राप्त कर लेंगे, हम अपने निज लोक अमरलोक जाने के पात्र बन जायेंगे, जीवनमुक्त अवस्था प्राप्त कर लेंगे । और-------------यही हमारा जीवन का मूल उद्देश्य भी है । हम अपने मूल उद्देश्य को न भूलें ।

हमारा स्थायी निवास "अमर लोक"

एलॉट्रॉनिक मीडिया में एक समाचार प्रसारित हो रहा है कि एक महिला जो कि बीजापुर(छत्तीसगढ़) की निवासी थी, वह राजस्थान में नॉकरी कर रही थी । लॉक डाउन में राजस्थान में फंस गई, अपने घर जाने की उसे इतनी तीव्र इच्छा हुई कि वह राजस्थान से घर के लिए पैदल ही निकल पड़ी(जबकि राजस्थान से बीजापुर की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 1100किलोमीटर है), अत्यन्त दुःखद विषय यह कि वह महिला बीजापुर पहुँचने के 10 किलोमीटर पहले ही दम तोड़ दी । लॉक डाउन काल में इस प्रकार की अनेक घटनायें समक्ष आ रही हैं कि घर पहुँचने की तीव्र तडफ़ से लोग घर की ओर पैदल ही चल पड़े एवं घर पहुँचने के थोड़ी ही दूरी पहले दम तोड़ दिए । उन सब मृतात्माओं को श्रद्धान्जलि अर्पित करते हुए एक चिन्तन उत्पन्न होता है कि पूर्ण रूप से अस्थायी निवास एवं अपने रिश्तेदारों से मिलने की हममें इतनी तीव्र तडफ़ होती है ।  तो हमारे उस स्थायी निवास *अमरलोक* जाने एवं हमारे अपने पिया *प्रभु(परमात्मा)* से मिलने की हममें कितनी तडफ़ होनी चाहिए ????  और.......... यह जीवित रहते हुए ही सम्भव है(मृत्यु के पश्चात नहीं) ।  इस परम् उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही यह देव दुर्लभ मानव तन हमें प्राप्त हुआ है । इस विषय में हम पूर्ण गम्भीरता से चिन्तन-मनन करें ।

मानव जीवन में मन की भूमिका

_*मानव जीवन में मन की भूमिका*_

*मन के हारे हार है! मन के जीते जीत!!*

*मन चंगा तो कठौती में गंगा !*

मानव जीवन में मन की बड़ी भूमिका है । मन के नियंत्रण में न होने से अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ, विसंगतियाँ, समस्यायें, उलझने--------स्वतः ही उत्पन्न हो जाती हैं । रोगों का कारण भी मन ही है, मन में सर्वप्रथम रोग उत्पन्न होता है, तब तन रोगी होता है । ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, अनिद्रा-----जैसे लाइलाज महारोगों के पीछे भी मन ही है । इन रोगों का मूल कारण तनाव है, तनाव का कारण मन का विचलन ही है । क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष-----आदि भावों का कारण भी मन है, हम अच्छी तरह से जानते हैं कि इन भावनाओं का हमारे जीवन में कितना दुष्प्रभाव पड़ता है , ये भावनायें हमारा जीवन को नर्क सा बना देती हैं । उत्साह, उमंग, उल्लास एवं उत्तेजना पूरित हमारा जीवन होना चाहिए, परन्तु हम पाते हैं कि इनका हमारे जीवन में नितांत अभाव है, इनके बगैर हमारा जीवन पूर्ण रूप से नीरस है । जीवन में नकारात्मक भाव का कारण भी मन ही है । हम जानते हैं कि जीवन संग्राम में हर क्षेत्र में विजयी होने के लिए सकारात्मक भाव की हमें कितनी आवश्यकता है ??
अब प्रश्न उठता है कि जब मानव जीवन में मन के नियंत्रण की इतना महत्व है, तो यह कैसे सम्भव हो पायेगा ??
इस पृथ्वी पर मन पर नियंत्रण का एक मात्र उपाय है– *विहंगम योग* ।
विहंगम योग की साधना से मन पर पूर्ण नियन्त्रण पाया जा सकता है, यहाँ तक कि हम इस साधना के द्वारा मन को अपने कारण अक्षर में विलीन कर अमन भी हो सकते हैं ।
जब विहंगम योग की साधना इतनी प्रभावशाली है, जीवन के लिए उपयोगी है या यह कहा जाए तो  अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि विहंगम योग की साधना के बगैर जीवन जीना ही असम्भव है । 
तो क्यों न हम विहंगम योग की साधना को अपने दिनचर्या का अंग बना लें ??
क्यों न हम ऐसा प्रयास करें कि हमारी जीवन शैली में विहंगम योग की साधना पूर्ण रूप से समाहित हो जाये ??

सदगुरु का शिष्य होना

हम सभी सद्गुरु शिष्यों में यह स्वाभिमान का भाव पूर्ण रूप से होना चाहिए कि हम अपने सहपाठियों–सहकर्मियों–परिजनों–मित्रजनों से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि हमें सद्गुरु की प्राप्ति हो गयी है । सद्गुरु परमात्म स्वरूप हैं, सद्गुरु की प्राप्ति का अर्थ है–परमात्मा की प्राप्ति । हमारा त्रयताप दुःखों से निवृत्ति एवं आवागमन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त है । गम्भीरता से विचार कीजिये हम सब कितने भाग्यशाली हैं ?
 सद्गुरु की प्राप्ति के पश्चात हमारा प्रथम कर्त्तव्य है कि हम सद्गुरु के आदेशों का अक्षरसः पालन करें । इसमें किसी भी स्थिति–परिस्थिति में कोताही न करें । इसमें ही हमारा कल्याण निहित है ।
 सद्गुरु का आदेश क्या है:– साधना–सेवा–सत्संग ।
सन्सार की चिंता हम क्यों करें ? सद्गुरु देव जी ने तो कहा है–"मैं चारों फ़ल का प्रदाता हूँ । मैं अपने शिष्यों–भक्तों का योगक्षेम करता हूँ ।"
सेवा एवं सत्संग तो हम थोड़ा-बहुत कर भी लेते हैं, परन्तु साधना में हम अब काफ़ी पीछे हैं (साधना के सम्बन्ध में हम स्वयं से प्रश्न करें तो यही उत्तर आएगा) ।
हम विधिवत साधना करें । हमारा यह प्रयास(पुरुषार्थ) होना चाहिए कि हम वर्तमान शरीर से जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त कर लें, परमात्मा की प्राप्ति हो जावे, पुनः हमें प्रकृति में न आना पड़े(आवागमन से मुक्ति पा जायें) ।

Tuesday, April 14, 2020

परमात्मा के प्रति कृतज्ञता का भाव

परमात्मा के प्रति शिकायत नहीं वरन सदैव हर हालात में कृतज्ञता का भाव हॄदय में रखना चाहिए ।

अनमोल मानव जीवन


मानव जीवन परमात्मा का एक अनमोल उपहार है, इसका हर पल आनन्द एवं शान्ति से व्यतीत हो, इस दिशा में हमारा सतत गम्भीर प्रयास होना चाहिए ।

Sunday, April 12, 2020

आत्मकल्याण की सार्थकता

सन्सार में हम सब कुछ पाकर भी उसका सुख प्राप्त नहीं कर सकते हैं, जब तक कि हम आत्म कल्याण के लिए समुचित प्रयास नहीं करते हैं ।

Saturday, April 11, 2020

मानव का सर्वांगीण विकास

मानव का सर्वांगीण विकास केवल सदगुरू शरण में रहकर साधना–सेवा–सत्संग करने में ही है और अन्य कोई उपाय नहीं है ।

Friday, April 10, 2020

आत्मिक उद्धार

प्रत्येक मानव का यह परम कर्त्तव्य है कि वह आत्मिक उद्धार को सर्व प्राथमिकता प्रदान करे, आत्मिक उद्धार के बगैर यदि यह जीवन समाप्त हो गया तो यह जीवन व्यर्थ है । अतः अपनी दिनचर्या में सांसारिक कार्यों को जिस प्रकार हम समयबद्ध करते हैं, उसी प्रकार आत्मिक उद्धार के लिए भी हमें समय सुनिश्चित करना चाहिए ।

Thursday, April 9, 2020

मानव जीवन की सार्थकता

हम सम्पूर्ण सन्सार को जानने का दावा करते हैं, यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हम स्वयं को जान पाए हैं ? सन्सार को जानने की अपेक्षा स्वयं को जानने में ही मानव जीवन की सार्थकता है ।

मानव कौन?

यदि कोई व्यक्ति हमारे प्रति विरोधी भाव रखता है तो वह उसका धर्म है, परन्तु हमारा धर्म यह है कि हम उसके प्रति कोई विरोधी भाव न रखें । सदैव हम सबका हित चिन्तन करें, जरूरत पड़ने पर हर हमेशा सहयोग के लिए तत्पर रहें । अन्य के सुख में अपना सुख, अन्य के विकास में अपना विकास समझने वाला व्यक्ति ही वास्तव में मानव कहलाने योग्य है ।

Tuesday, April 7, 2020

आलोचना

कोई यदि हमारी किसी भी प्रकार की आलोचना करता है, तो हम उस व्यक्ति के प्रति कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचें, बल्कि हम आत्मावलोकन करें कि व्यक्ति के कथनानुसार हममें कोई दोष तो नहीं है, यदि ऐसा कुछ है तो दोष का निराकरण करें ।

Monday, April 6, 2020

संवाद की शर्तें

हम जब भी किसी व्यक्ति से संवाद कर रहे हों, तब हमें इन बातों का पूर्ण रूप से ध्यान रखना चाहिए–हमारे हृदय में व्यक्ति के प्रति पूर्ण सम्मान एवं प्रेम का भाव हो, वाणी में कोमलता हो, स्वयं में विनयशीलता हो,  हमारे हृदय में उस व्यक्ति का हित का चिन्तन हो, हम किसी प्रकार से पूर्वाग्रह से ग्रसित न हों, भाषा पर पूर्ण नियंत्रण हो, व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान हो ।

Sunday, April 5, 2020

सदगुरु की सेवा

सेवा के द्वारा श्री सदगुरु प्रभु जी को प्रसन्न कर हम स्वयं का पूर्ण आत्मिक एवं सांसारिक कल्याण कर सकते हैं, इसके अलावा इस धरती पर इसके लिए अन्य कोई उपाय नहीं है ।

दान की सार्थकता

देने का भाव एवं फल प्राप्ति की इच्छा शून्य होने पर ही दान सार्थक होता है ।

पूर्वाग्रह

अध्यात्म हो या सन्सार शिखर तक पहुँचने के लिए समस्त पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना पड़ेगा । पूर्वाग्रहों का भार लेकर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते हैं ।

Friday, April 3, 2020

जीवन का उद्देश्य

मानव जीवन का परम् उद्देश्य आत्म कल्याण एवं गौण उद्देश्य सांसारिक उपलब्धियाँ हैं, परन्तु इसका स्पष्ट बोध हमें न होने के फ़लस्वरूप हमारे समक्ष अनेक प्रकार की समस्यायें, उलझने, विसंगतियाँ, रोग------उपस्थित हैं ।