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कोरोना संकट:मनुष्य और सृष्टि
वर्तमान में जो परिस्थिति निर्मित हुई है, वह निश्चित रूप से अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, समूची दुनिया पर इसका बड़ा ही बुरा प्रभाव पड़ा है । फ़िलहाल तो ये बताना भी मुश्किल है कि स्थितियाँ कब सामान्य होंगी ? एक बड़ी आबादी का जीवन ख़तरे में पड़ गया है । चारों तरफ़ अनिश्चितता का माहौल है ।
इस बीच लोगों ने अपना बहुत कुछ खो दिया है–अनेकों ने अपनी बचतें खो दी हैं । वे आर्थिक रुप से असुरक्षित हो गये हैं । समाज–परिवार के होते हुए भी लोग एकाकी जीवन जीने को विवश हो गये हैं ।
लोगों का व्यापार–धंधा, सब-कुछ चौपट हो गया है । इनकी अपूरणीय क्षति हुई है ।
इधर कोरोना वायरस के उपचार या वैक्सीन बनाने की दिशा में किसी को कोई सफ़लता नहीं मिली है, और निकट भविष्य में भी इसकी सम्भावना भी कम ही दिख रही है ।
अब सवाल ये है कि लोग क्या करें ? क्या हाथ पे हाथ धरकर बैठे रहें और उदास, निराश, हतोत्साहित हो जायें ?
आर्थिक असुरक्षा का भाव से एक बारगी तो उबरना ही होगा । इसी से नकारात्मकता समाप्त होगी और जो दैनन्दिन जीवन में अनियमितता आई है, उससे भी छुटकारा मिलेगा । लोगों से ख़त्म हो रहे संबंधों को सहेजना होगा ।
कोरोना वायरस से हमारी संस्थाएँ अपने हिसाब से तो लड़ रही हैं पर दूसरी ओर हमें भी व्यक्तिगत रुप से इसके संभावित दुष्प्रभावों से लड़ते रहना होगा ।
आख़िर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । उसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए ! उसे खुद की और परिवार का ख़्याल तो रखना ही है, यथासंभव समाज के दूसरे लोगों का भी रखना है ।
इस ख़ालीपन के समय में आत्मचिंतन का अच्छा अवसर मिला है । अपने व्यसनों से छुटकारा पाने का अच्छा अवसर मिला है । स्वयं को, ईश्वर को और समूची सृष्टि को नये सिरे से परखने, समझने और आत्मसात् कर एक बेहतर दुनिया बनाने का अवसर मिला है ।
आईये, हम सभी इस महामारी को भी मानव कल्याण के एक अभूतपूर्व अवसर में बदलने पर काम करें !
दिनेश राव
Monday, June 1, 2020
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